Tuesday, December 29, 2009

दिल्ली मेट्रो......

डेल्ही मेट्रो की परिधि अब बढ़ चुकी है । डेल्ही से शुरू हुआ इसका सफ़र अब NCR तक पहुँच चुका है। नॉएडा जाना अब आसान हो गया है ...क्योंकि डेल्ही मेट्रो अब आपको नॉएडा तक बड़े प्यार से ले जाती है । पर बात करें उनलोगों की जो इसके पुराने यात्री हैं ....यानि जिन्हें केवल राजौरी , करोल बाग या फिर राजीव चौक तक जाना होता है...उनके हिस्से का प्यार बंट चुका है । यात्री ज्यादा हो चुके है और ट्रेनों की संख्या लगभग उतनी ही है। पर ट्रैफिक और सहूलियत के हिसाब से मेट्रो ही बेस्ट आप्शन है।

मैं मेट्रो की प्रशंसक रही हूँ । आज मैं नवादा से झंडेवालान के लिए निकली...रोज़ निकलती हूँ... करीबन २:३० बजे दोपहर को । ट्रेन आई... ओफ्कोर्स सीट नहीं मिली । जब से नॉएडा सिटी सेण्टर तक metro जाने लगी है अमूमन ऐसा ही होता है। कभी जब सीट मिलने की उम्मीद नहीं होती है तो दरवाजे से लगकर खड़ी हो जाती हूँ पर आज मैं ज़रा थकी हुई थी इसीलिए rows के सामने जा कर खड़ी हो गयी । उत्तम नगर east के पास सीट खाली हुई । वहां खड़े सारे लोगों के बीच बैठने का हक़ मेरा ही था क्योंकि वहां खड़े सारे लोगों में एक मैं ही लड़की थी । जनकपुरी पहुँचने पर मेरे सामने एक बुज़ुर्ग महिला आ कर खड़ी हुईं । शिष्टाचारवश मैंने उन्हें अपनी सीट ऑफर की । उन्होंने बड़े प्यार से मुझे धन्यवाद कहा और बैठ गयीं... सच बताऊँ तो उस वक्त उनके लिए खड़ा होना मुझे तनिक भी बुरा नहीं लगा ...बुरा तो तब लगा जब बूढी आंटी के बगल की सीट खाली हुई और उनकी नज़रें मुझे छोड़ अपनी बेटी से टकराईं ...और उन्होंने इशारे से उसे अपने पास बैठने के लिए बुलाया ...खैर.....उस सीट पर मेरी बगल में खड़ा एक लड़का बैठ गया । आंटी की आँखों से खीझ साफ़ दिख रही थी .उस लड़के को शायद पता नहीं था कि वो महिला सशक्तिकरण के दौर में सफ़र कर रहा है ...सामने खड़ी आंटी ने वो खरी खोटी सुनाई ...सामने लेडीज खड़ी है और तुम बैठ रहे हो ...पता नहीं कब अक्ल आएगी....और पता नहीं क्या क्या.....पर लड़का शरीफ था ..खड़ा हो गया ...यक़ीनन उस वक्त उसे अपने पुरुष होने पर अफ़सोस हुआ होगा ......पता नहीं हमारा समाज लिंग भेद भाव से कब निजात पायेगा ...ये उस शरीफ लड़के की दिल की आवाज़ थी....
ट्रेन के अन्दर लोगों की संख्या बढती ही जा रही थी साथ ही खड़े होने की जगह भी कम होती जा रही थी ...शादीपुर के पास एक सीट खाली हुई ..मैंने सोचा चलो १० मिनट बैठने को मिल जाएगा पर मेरे बैठते ही एक नयी नवेली आंटी ( शादी होते ही लड़की आंटी बन जाती है ) ने कहा सीट दे देंगी प्लीज !!!!! मैं बिलकुल भी उठना नहीं चाहती थी ..पैरों में बहुत दर्द हो रहा था ...पर मैं आंटी नहीं हूँ ...और मैं सीट छोड़ के खड़ी हो गयी ....राजेंद्र प्लेस आते ही मैंने धीरे धीरे दरवाजे की ओर बढ़ना शुरू कर दिया था पर करोल बाग आते ही एक बहुत बड़ा हुजूम अन्दर आया और फिर पैर बढ़ने को एक इंच की भी जगह नहीं बची जिन्हें नहीं उतरना वो भी दरवाजे से चिपक कर खड़े हैं...मैंने सामने वाले excuse me कहा ...उसने कहा... कहाँ जाऊं ...नहीं जा सकता....मैंने कहा जाना तो पड़ेगा क्योंकि मुझे यहीं उतरना है ....उन्होंने अनसुना कर दिया...दरवाजे पर अपने तीन बच्चों के साथ खड़ी मम्मी ने कहा...बच्चों साइड मत होना अगर बाहर निकले तो फिर अन्दर नहीं आ पाओगे ...कहना न होगा मैं बुरी तेरह से फंस चुकी थी ...पूरा प्रयास कर चुकी थी पर उन भीमकाय लोगों के सामने मुझ कृशकाय की क्या बिसात ...अब कहाँ कोई कृष्ण मुसीबत में फंसे लोगों की मदद करते हैं.....मैं दो स्टेशन आगे राजीव चौक पर ही उतर पायी और फिर दूसरी ट्रेन से अपने गंतव्य पहुंची ....

ये है मेरी आज की या य़ूं कहें आजकल की मेट्रो जर्नी...

रचना श्रीवास्तव ,दिल्ली